His speech given at the poets meet held at Delhi on the occassion on receiving the National Sahitya Academy Award on 21st February,2008.
प्रसंगोचित वक्तव्य
आजका यह अवसर महत्त्वपूर्ण है गुजराती कविता के लिये और विशेषत: गुजराती गज़ल के लिये क्यों कि यह पारितोषिक ‘गज़लसंहिता’ को उपलब्ध हुआ है जो पांच मंडलो में विभाजित है।
और मुझे आनंद इस बात का भी है कि आज मैं यहां गुजराती गज़लका प्रतिनिधित्व कर रहा हुं जो राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार ही पुरस्कृत हो रही है।
गुजराती भाषा में गज़लसर्जन की परंपरा प्राय: एक सौ पचास वर्ष पुरानी है। गज़ल का गुजराती भाषा में प्रथम अवतरण उन साक्षरों के द्वारा हुआ जो गुजराती काव्यसर्जन के मुख्य प्रवाह से संलग्न थे, फारसी के ज्ञाता और सुफीवाद से प्रभावित। बादमें कुछ एसा हुआ कि गुजराती गज़ल मुख्य कवितप्रवाह से अलग, सभारंजन की सपाटबयानी में बहने लगी, काव्यतत्त्व क्षीण सा होता चला।
फिर गत शताब्दी के उत्तरार्ध से एक नये परिवर्तन का आरंभ हुआ। मुख्य प्रवाह से संलग्न और आधुनिकता से प्रभावित एक बलवान कविसमूह गज़लसर्जन में प्रवृत्त हुआ और गज़ल की धारा मुख्य धारा से सम्मिलित होने लगी। परिवर्तन की यह प्रक्रिया काफी रोचक रही और परिणामदायिनी भी। गज़ल का बाह्य स्वरूप प्राय: वही रहा किंतु अंतस्तत्त्व में आमूल परिवर्तन हुआ, जो अनेकस्तरीय था। अरबी फारसी शब्दों के साथ संस्कृत तत्सम एवं तद्भव पदावली भी प्रयुक्त होने लगी। गज़लके परंपराप्राप्त बिंब और प्रतीकों का स्थान भारतीय एवं जानपदी बिंब और प्रतीकों ने लिया। अन्य काव्यस्वरूपों का सूक्ष्म प्रभाव भी दृष्टिगोचर होने लगा। उत्कट प्रयोगशीलता भी देखने मिली। संक्षेपमें, एक दूसरी भाषा और संस्क़ृति से आये काव्पप्रकार ने भारतीय और गुजराती परिवेश धारण किया। यह प्रक्रिया अब भी प्रवर्तमान है।
यह भी अपेक्षित है कि मैं मेरे बारे में भी कुछ कहूँ। गुजराती काव्यसाहित्य के प्रचलित काव्यस्वरुपों से मेरे समकालीनो की तरह मैंने भी प्रारंभ किया, उसमे गज़ल भी शामिल थी। फिर शनै: शनै: मेरी काव्याभिरुचि एवं मेरी सृजनशीलता गज़ल की और विशेष आकृष्ट होती रही तो मेरी अभिव्यक्ति प्रधानतया गज़ल के काव्यरूप में होने लगी। इत्तफाकन् मेरी प्रथम मुद्रित रचना गज़ल ही थी जो सुप्रसिद्ध गुजराती सामयिक ‘कुमार’में सन 1962मे प्रकट हुई, वह भी काव्यमर्मज्ञ संपादक श्री बचुभाइ रावत के स्वागतवचन के साथ। उस वक्त उन्होने गज़ल-सर्जन की महती संभावना का उल्लेख किया था – वह आज शायद मूर्त हो रहा है।
किशोरावस्था से ही मुझे यह प्रतीत हो होने लगा था कि मेरे अस्तित्व की अभिव्यक्तिका माध्यम शब्द है। शब्द को मैंने एक वरदान के रुप में देखा. और वही मेरे लिये उपास्य हो गया। पूरी भाषाको अवगत करनेके लिये मैं संस्कृत-प्राकृत-अपभ्रंश को अध्ययन विषय चुनकर स्नातक-अनुस्नातक हुआ। इससे मैं वैदिक-औपनिषदिक दर्शन, श्रमणपरंपरा एवं जैन-बौद्ध दर्शन और प्रशिष्ट काव्यपरंपरा से परिचित हुआ। अनुस्नातक कक्षा में भारतीय काव्यशास्त्र का विशेष अध्ययन किया। मेरी काव्यविभावना आनंदवर्धन, अभिनवगुप्तपाद आदि आचर्योंसे प्रभावित है, मैं व्यंजनावादी हूँ। मैंने काव्यसर्जन को उस आंतरिक आध्यात्मिक प्रवृत्ति के रूप में देखा है जो मेरे आत्मप्रत्यय मे सहायभूत हो। शब्दों के द्वारा शब्दातीत महामौन का अनुभव, वैखरीके अनिवार्य माध्यम से परा का संस्पर्श मेरा लक्ष्य है, जो लक्ष्य मी नहीं।
प्रथम से ही भारतीय दर्शनों के प्रति आकर्षण रहा, तो आचार्य गौडपाद, श्रीमत् शंकराचार्य और भगवान रमण महर्षि मेरे आराध्य रहे। गुजरात-सौराष्ट्र के मध्यकालीन लोकसंत परंपरा के तत्त्वानुभव ने मेरी अद्वैतनिष्ठा को पुष्ट किया और उनकी सरल सहज अभिव्यक्तिने मेरी सर्जन प्रक्रियाको। सूफीदर्शन और प्रेमलक्षणा भक्तिकी भी कुछ झलक मेरी गज़लोंमे आ गई है।
एक महत्वपूर्ण अनिर्वचनीय का तो विस्मरण ही हो गया। मेरी काव्यचेतना का प्रथमोदय गिरनार की उपत्यका मे हूआ। जूनागढ, गिरनार ओर गुजरात के आद्यकवि नरसिंह महेता की काव्यचेतना के साथ कुछ गूढ अनुसंधान मेरा निरंतर अनुभव रहा है।
अंतमे मैं मेरी कुछ रचनाएं, यथाशक्य हिन्दी रूपांतर में प्रस्तुत करुंगा जो मेरे सृजनानुभव की यत्किंचित परिचायक हो।
सभर सुराही, ललित लचक कटि, कोमलस्कंधा गज़ल।
वन वन भमतां मिलत अतर्कित योजनगंधा गज़ल।
लखचोरासी लखत लखत चख वेधत रे लख सकल,
अलख अलख गिरनारी गाजे नित पडछंदा गज़ल।
चाक गरेबाँ बेबाक दिशाएं, दामन दर दर उडे,
अष्टपाश आकाश उडावत, त्रुटितफंदा गज़ल।
साँस उसाँस चलावत छुवत झिलमिल सातों गगन,
विहँस विहँस करताल नचावत, गावत बंदा गज़ल।
कँह लग रूठो, मान करो अति, मुख मचकोडो अलग,
सूर मिलाये गाओ प्रियजन सत्-चित्-नंदा गज़ल।
पूर्ण में से अंश अवतारी हुआ,
स्वाद कारण शब्द संसारी हुआ।
अरे आया अजायब मोड बिस्मिल्लाह,
लगा के दौड, रे तू दौड, बिस्मिल्लाह।
इलम-शलाका अवल फिराई रे जादूगर,
सुधबुध हमरी सब बिखराई रे जादूगर,।
नहीं अधार, नहीं अवलंबन, अचरज भारी,
खलक अजब जुगते ठेराई रे जादुगर।
दृश्ये कलकल वहूँ पलक पल पिरो पिरोकर
हेरत हाल सूरत हेराई रे जादुगर।
झांझ पखवाज बाज करताल आज,
सूर घेघूर पूर मत बांध पाज।
बिंत वृखभान इब्न ब्रजराज, वाह -
जुगलसरकार आज महेफिल नवाज़।
तीर कालिंद शाख कादंब तख्त
फरफरे मोरपिच्छ सरताज ताज।
भान लवलेश शेष झळहळ मशाल,
श्वास ऊच्छ्वास खेल अय खुशमिजाज़।
रोशनी रोशनी सुर्खतर,
धडकनें और धकधक चली।
लौ लगी तो लगी रातभर,
एक करताल भरचक चली।
चडो चाखडी, पवनपावडी जय गिरिनारी,
क्या है मेरु, क्या है मंदर चेत मछंदर।
गगनघटा में एक कराको बिजरी हुलसी,
घिर आई गिरिनारी छाया गोरख आया।
हजो हाथ करताल ने चित्त चानक,
तळेटी समीपे हजो क्यांक थानक।
लई नाँव थारो समयरो हळाहळ,
धर्यो होठ त्यां तो अमियेल पानक।
सुखड जेम शब्दो उतरता रहे छे,
तिलक कोई आवीने करशे अचानक।
अमे जाळव्युं छे झीणेरा जतनथी
मळ्युं तेवुं सोंपीशुं कोरुं कथानक।
छे चन जेनुं एना ज पंखी चुगे आ
रखी हथ्थ हेठा निहाळे छे नानक।
नयनथी नीतरती महाभाबमधुरा,
बहो धौत धारा, बहो ग़ौड गानक।
शबोरोज़ एनी महकनो मुसलसल,
अजब हाल हो और अनलहक हो आनक।
भाष्यकार कोई आयेगा कभी,
मौनकी रचो निग़ूढ कारिका।
- राजेन्द्र शुक्ल
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